राष्ट्रमण्डल देश (कॉमनवेल्थ)

आधुनिक राष्ट्रमण्डल 53 देशों का समूह है जिसमें 2.4 अरब से ऊपर की जनसंख्या रहती है या कह सकते हैं कि पूरी दुनिया की 30 प्रतिशत जनसंख्या। यह संगठन स्वैछिक सदस्यता के सहमति आधारित मॉडल पर काम करता है और इसका एक मूलभूत घोषणापत्र भी है जो साझा मूल्यों और सिद्धांतों, साझी भाषा और संस्थाओं को रेखांकित करता है। राष्ट्रमण्डल समूह की परिकल्पना एक ऐसे राष्ट्रमण्डल को बनाए रखना है जो सभी के द्वारा सम्मानित, लचीला, शांतिपूर्ण और ख़ुशहाल हो और जो समानता, विभिन्नता और साझे मूल्यों को मान देता हो।

महिला अधिकारों के संदर्भ में, 18 राष्ट्रमण्डल देश ऐसे हैं जो विवाह के अन्दर हुए बलात्कार को अपराध नहीं मानते हैं और 20 से अधिक ऐसे हैं जिनके पास यौन उत्पीड़न और शोषण को लेकर कोई विशेष क़ानून नहीं है। कई अन्य देश महिलाओं और किशोरियों को औपचारिक अर्थव्यवस्था से बाहर करके, महिला उत्तराधिकार पर रोक लगा के, महिलाओं को भूमि अधिकार ना देकर और किशोरियों के जल्दी विवाह प्रचलन को ना रोक कर और लड़कियों का ख़तना जैसी प्रथाओं को जारी रख कर उनके विरुद्ध भेदभाव करते हैं ।

एलजीबीटी (समलैंगिक महिला-पुरुष, द्विलिंगी और ट्रान्सजेण्डर) समुदाय के समान अधिकारों की बात करें तो अभी भी 36 राष्ट्रमण्डल देश समलैंगिक गतिविधियों को अपराध की श्रेणी में रखते हैं।

बहुत से ऐसे क़ानून जो महिलाओं और किशोरियों, एलजीबीटी व्यक्तियों के विरुद्व भेदभाव करते हैं, औपनिवेशिक दौर के पुराने क़ानून हैं,  जिनमें सुधार करने की आवश्यकता है।

समानता व न्याय गठबंधन सम्पूर्ण राष्ट्रमण्डल में काम करते हुए अफ़्रीका, एशिया, कैरेबियन और प्रशांत/ पेसिफिक क्षेत्रों में गतिविधियों और साझेदारी पर ध्यान केन्द्रित करते हुए इन क़ानूनी सुधारों और संशोधन की आवश्यकता का समर्थन करता है।

आधुनिक राष्ट्रमण्डल 53 देशों का समूह है जिसमें 2.4 अरब से ऊपर की जनसंख्या रहती है या कह सकते हैं कि पूरी दुनिया की 30 प्रतिशत जनसंख्या। यह संगठन स्वैछिक सदस्यता के सहमति आधारित मॉडल पर काम करता है और इसका एक मूलभूत घोषणापत्र भी है जो साझा मूल्यों और सिद्धांतों, साझी भाषा और संस्थाओं को रेखांकित करता है। राष्ट्रमण्डल समूह की परिकल्पना एक ऐसे राष्ट्रमण्डल को बनाए रखना है जो सभी के द्वारा सम्मानित, लचीला, शांतिपूर्ण और ख़ुशहाल हो और जो समानता, विभिन्नता और साझे मूल्यों को मान देता हो।

 

महिला अधिकारों के संदर्भ में, 18 राष्ट्रमण्डल देश ऐसे हैं जो विवाह के अन्दर हुए बलात्कार को अपराध नहीं मानते हैं और 20 से अधिक ऐसे हैं जिनके पास यौन उत्पीड़न और शोषण को लेकर कोई विशेष क़ानून नहीं है। कई अन्य देश महिलाओं और किशोरियों को औपचारिक अर्थव्यवस्था से बाहर करके, महिला उत्तराधिकार पर रोक लगा के, महिलाओं को भूमि अधिकार ना देकर और किशोरियों के जल्दी विवाह प्रचलन को ना रोक कर और लड़कियों का ख़तना जैसी प्रथाओं को जारी रख कर उनके विरुद्ध भेदभाव करते हैं ।

एलजीबीटी (समलैंगिक महिला-पुरुष, द्विलिंगी और ट्रान्सजेण्डर) समुदाय के समान अधिकारों की बात करें तो अभी भी 36 राष्ट्रमण्डल देश समलैंगिक गतिविधियों को अपराध की श्रेणी में रखते हैं।

बहुत से ऐसे क़ानून जो महिलाओं और किशोरियों, एलजीबीटी व्यक्तियों के विरुद्व भेदभाव करते हैं, औपनिवेशिक दौर के पुराने क़ानून हैं,  जिनमें सुधार करने की आवश्यकता है।

समानता व न्याय गठबंधन सम्पूर्ण राष्ट्रमण्डल में काम करते हुए अफ़्रीका, एशिया, कैरेबियन और प्रशांत/ पेसिफिक क्षेत्रों में गतिविधियों और साझेदारी पर ध्यान केन्द्रित करते हुए इन क़ानूनी सुधारों और संशोधन की आवश्यकता का समर्थन करता है।

4 क्षेत्र
अफ़्रीका

अफ़्रीका

अफ़्रीका राष्ट्रमण्डल में 19 देश हैं। इनमें 15 देश ऐसे हैं जो दो वयस्कों के बीच सहमति से बनाए गए समलैंगिक संबन्धों को अपराध मानते हैं, अधिकतर यह उन पुरुषों पर लागू किया जाता है जो अन्य पुरुषों से यौन संबन्ध बनाते हैं। अफ़्रीका में ही 6 देशों में महिलाओं के प्रति घरेलु हिंसा के विरुद्ध कोई विधिक संरक्षण नहीं है (बुरकीना फ़ासो, कोटे डिल्वोएर, मिस्र, लिसोथो और नाइजर) – लिसोथो भी एक राष्ट्रमण्डल देश है। लड़कियों में ख़तना कराने की प्रथा अफ़्रीका के लगभग आधे राष्ट्रमण्डल देशों में प्रचलित है, जिसमें गाम्बिया और सिरा लिओन में ही इसके प्रचलन, एक अनुमान के अनुसार 76 और 88 प्रतिशत है। यह हानिकारक और नुक़सान पहुँचाने वाली प्रथा एक लड़की के स्वास्थ्य, शिक्षा, समानता, बराबरी और हिंसा और शोषण मुक्त जीवन जीने के अधिकार को प्रभावित करती है।

अफ़्रीका राष्ट्रमण्डल देशों में व्यापक रूप से महिलाओं व किशोरियों के लिए समान अवसर देने में अनेक बाधायें हैं। 5 में से 2 महिलायें (38%) यौन साथी या अन्य के द्वारा शारीरिक, और/या, यौनिक हिंसा का अनुभव करती है (यह दक्षिण पूर्व एशिया और मध्य पूर्व/पूर्वी मेडिटिरेनियन के बाद दुनिया में तीसरी उच्चतम दर है)। इस हिंसा की स्थिति को सामाजिक स्थिति, आर्थिक स्थिति और शिक्षा में मौजूद इन्टरसेक्शनेलिटी या दूसरी तरह से कहें तो सभी तरफ़ समान रूप से प्रचलित भेदभाव, और भी बिगाड़ देता है या ख़राब कर देता है। विकलांग महिलायें, प्रवासी महिलायें, महिलायें जिनकी अलग जेण्डर पहचान है और यौनिक रूप से अल्पयंख्यकों की स्थिति तो और भी संवेदनशील और कमज़ोर है।

एशिया

एशिया

70% से अधिक राष्ट्रमण्डल नागरिक उन 7 देशों में रहते हैं जो एशिया राष्ट्रमण्डल बनाते हैं।

हॉलाकि दक्षिण एशिया के अधिकतर देशों में ऐसे क़ानूनी प्रावधान हैं जो विवाह की आयु सीमा 18 या उससे अधिक बताते हैं, फिर भी इस क्षेत्र में दुनिया के किसी भी हिस्से की तुलना में उच्च दर का बाल विवाह, जल्दी विवाह और जबरन विवाह प्रचलित है। बांग्लादेश में सबसे अधिक लगभग 59% और भारत में लगभग 27% दर है। महिलाओं और किशोरियों को भी गंभीर रूप से अपने मानवाधिकारों के हनन का सामना करना पड़ता है, जैसे जेण्डर आधारित हिंसा, यौनिक हिंसा और उत्पीड़न। वे अपने घरों और सामाजिक क्षेत्रों में निर्णय लेने या राजनीतिक निर्णय लेने में पीछे रखीं जाती हैं।

सितम्बर 2018 तक, जब भारत ने भारतीय दण्ड संहित की धारा 377 को निरस्त कर दिया, उसके बाद दो समलैंगिक व्यस्कों के बीच सहमति से हुई यौनिक गतिविधि को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया गया, पर अन्य सभी एशिया राष्ट्रमण्डल देशों ने समलैंगिक यौनिक गतिविधियों को रोकने वाले क़ानूनों को बनाए रखा है। केवल श्रीलंका की सरकार ने अपने 2017 के मानवाधिकार कार्य योजना/एक्शन प्लान में सुधार किया है और यौनिक रुझान के आधार पर होने वाले भेदभाव को उसमें शामिल किया है, हॉलाकि अभी भी वहाँ समलैंगिक संबन्ध अपराध की श्रेणी में आते हैं। भारत के सर्वोच्च न्यायालय का यह फ़ैसला इसलिए इस क्षेत्र के देशों के लिए एक बड़े संकेत के रूप में देखा जा रहा है।

अपनी हाल के धारा 377 से जुड़े फ़ैसले के अलावा, भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने 2012 में ट्रान्सजेण्डर व्यक्तियों के संवैधानिक अधिकारों को पहचाना था, जिसके बाद ही 2014 में ट्रान्सजेण्डर व्यक्तियों के अधिकार पर बिल बनाया गया। और बांग्लादेश की सरकार नें 2013 में विधिक रूप से हिजड़ा जनसंख्या को एक ‘‘तीसरे लिंग/जेण्डर’’ की पहचान देते हुए उन्हें वोट डालने का अधिकार दिया।

कैरेबियन और अमरीकी

कैरेबियन और अमरीकी

कैरेबियन और अमरीका में मुख्य रूप से के छोटे-छोटे द्वीप राष्ट्रमण्डल देशों का हिस्सा है। यह क्षेत्र महिला अधिकारों के क्षेत्र में महत्वपूर्ण रूप से प्रतिबद्धता दिखा रहा है और जेण्डर समानता की तरफ़ प्रगति कर रहा है। इस क्षेत्र के सभी देशों ने महिलाओं के विरुद्ध सभी प्रकार के भेदभाव पर अंतर्राष्ट्रीय संधि (सीडा) को अंगीकार किया है। इसके अलावा, यह क्षेत्र अर्न्त-अमरीका के मानवाधिकारों की संरक्षण व्यवस्था के तहत आता है और सभी देशों (कनाडा के अलावा) ने अर्न्त-अमरीकी संधि को भी अंगीकार किया है जो महिलाओं के विरुद्ध हिंसा को रोकने, दण्ड देने और समाप्त करने के बारे में है (इसे बेलम दो पारा संधि भी कहते हैं)।

इस सब के बावजूद इस क्षेत्र में जेण्डर हिंसा और यौनिक हिंसा की दर उच्च है; इस क्षेत्र की प्रत्येक 3 में से 1 महिला (29.8%) ने अपने जीवन में शारीरिक और/या यौनिक हिंसा का अनुभव किया है। इसके अलावा, राष्ट्रमण्डल के 13 कैरेबियन और अमरीकी देशों ने दो वयस्कों के बीच सहमति से बने समलैंगिक संबन्धों को अपराध की श्रेणी में रखा है। फिर भी, अभी हाल ही में इस क्षेत्र में कुछ उम्मीद और प्रोत्साहन देने वाले भी क़दम उठे हैं, जिसमें बेलिज़ में सर्वोच्च न्यायालय का 2016 का फ़ैसला है जिसने देश के उस क़ानून को जो पुरुष यौन संबन्ध को प्रतिबंधित करता है, असंवैधानिक घोषित किया है और ऐसे ही एक फ़ैसला त्रिनिदाद और टोबैगो की अदालत से 2018 में आया है।

पैसिफ़िक

पैसिफ़िक

आस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैण्ड के अलावा, पैसिफ़िक राष्ट्रमण्डल छोटे-छोटे द्वीपों से बना है। 11 पैसिफ़िक राष्ट्रमण्डल देशों में से 5 देशों ने दो वयस्कों के बीच सहमति से होने वाले यौन संबन्धों को अपराध की श्रेणी में रखा है। फिर भी, इधर हाल में प्रगतिशील सुधारों की तरफ़ कुछ बदलाव हुए हैं। फ़ीजी का नया संविधान, जो 2013 में लागू हुआ है, यौनिक रुझान, जेण्डर पहचान और जेण्डर व्यवहार के आधार पर किसी भी प्रकार के भेदभाव को प्रतिबंधित करता है (हॉलाकि समलैंगिकता अभी भी अपराध है), और समोआ ने श्रम और रोज़गार संमबन्धित क़ानून 2013 लागू किया है जो रोज़गार क़ानूनों में भेदभाव के प्रावधानों से संरक्षण के तौर पर यौनिक रुझान और कथित या वास्तविक एचआईवी स्थिति को शामिल करता है।

पैसिफ़िक राष्ट्रमण्डल देशों में, अधिकतर के पास महिलाओं और किशोरियों को भेदभाव से संरक्षण के क़ानून हैं और वे जेण्डर समानता को बढ़ावा भी देते हैं। फिर भी, यह विधिक प्रावधान ना तो हमेशा लागू होते हैं और ना ही इस्तेमाल किए जाते हैं। नतीजे के तौर पर पूरे पूर्वी अफ़्रीका और पैसिफ़िक में, प्रत्येक 4 में से 1 महिला (24.6%) अपने जीवन में शारीरिक और यौनिक हिंसा का अनुभव करेगी और प्रत्येक 6 में से एक किशोरी का 18 वर्ष से कम आयु में ही विवाह हो जाएगा। कुछ देशों में यह आंकड़े इससे भी अधिक दर के हैं – फ़ीजी में, 64% महिलायें अपने अंतरंग साथी द्वारा शारीरिक या यौनिक हिंसा का अनुभव करती हैं, और पपुआ न्यू ग्वीनिया में प्रत्येक 2 में से 1 पुरुष ने बताया कि उसने किसी महिला का बलात्कार किया है।

इसके अलावा, महिलायें और किशोरियों को शिक्षा और न्यायिक व्यवस्था और स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच बनाने के लिए असामानता का सामना करना पड़ता है। पपुआ न्यू ग्वीनिया में, विशेषकर, जहाँ औपचारिक और परंपरागत न्यायिक व्यवस्था की दोहरी प्रणाली है, महिला की न्याय तक पहुँच बहुत सीमित है और जिसके नतीजे में उसके साथ व्यवस्थात्मक रूप से भेदभाव होता है। साथ ही, क्षेत्र में एक व्यापक रूप से प्रचलित अंधविश्वास ‘‘संगूमा’’ (जादूटोना) के चलते भी अक्सर महिलाओं और किशोरियों के साथ बलात्कार, यातना देना और उनकी हत्या कर देने जैसे मामलों को उचित और न्यायसंगत ठहराया जाता है।